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Friday, November 12, 2010

कुत्तो का आतंक ..

अचानकमार में कुत्तो का आतंक .......जो लोग अचानकमार अभ्यारण्य को नही जानते उनके लिए ये खबर चौकाने वाली नही  होगी...मेरे लिए और उन सब के लिए ये खबर जरुर कई मायनो में ख़ास है...हमने अचानकमार इलाके को काफी करीब से देखा और जाना है...बात कल ही की तो है...मै अपने दफ्तर में बैठा अखबार के पन्ने पलट रहा था..."अचानकमार में कुत्तो का आतंक"...इस शीर्षक पर नजर पड़ी तो खबर पढने का मन हुआ...पूरा पढने के बाद मै सोचने लगा अभयारण्य के भीतर बड़ी संख्या में कुत्ते आखिर आये कहाँ से...जंगल में कुत्ते है,या खबर के जरिये कुत्तो का आतंक फैलाया जा रहा है....सच तो वही बताएगा जिसने बिना कुत्तो के आतंक झलकाती तस्वीर के आतंक फैलाने की कोशिश की है....ये खबर उनके लिए भी चौकाने वाली हो सकती है जो अचानकमार को "शेरो"के नाम से जानते है...केवल जानते है....जी हाँ पिछले १० बरसो में मैंने तो शेर नही देखा...वन महकमे के अधिकारियों से जितना सुना उसके मुताबिक जंगल में २६ "टाइगर" है...हाँ वो आंकड़े वाले शेर वी.वी.आइपी को जरुर दिख जाते है...उसके लिए वन महकमा पहले से मुनादी करवाता है और वी.वी.आइपी को शेर दिखा दिया जाता है...जिस अचानकमार अभ्यारण्य में २६ शेर है वहाँ कुत्तो का आतंक ? बड़ा अटपटा सा लगता है...मैंने सोचा मेरे ही एक साथी ने खबर छापी  है जरुर कुछ तो ख़ास होगा...फिर ख़याल आया कोई नई बात थोड़े ही है,वन महकमे का अधिकारी जब चाहता है अखबार में शेर दिख जाता है...जब उसकी इच्छा होती है जंगल में कुत्ते आतंक मचाने लगते है....जरूर इस बार कुत्तो की बारी लगती है ऐसा सोच कर मैंने अखबार के पन्ने को पलट दिया....अरे जिस अचानकमार अभयारण्य को अधिकारी की काबिलियत पर बिना शेर की गड़ना हुए "टाइगर रिजर्व" बना दिया गया हो,जहाँ करोडो रूपये उन शेरो के संरक्षण पर खर्च कर दिए गए हो जिनकी वास्तविक संख्या का पता आज तक नही चल सका है,वहाँ कुत्तो का आतंक मचा हो नया नही लगता...हर साल शेरो की गिनती होती है,उनके पगचिन्ह खोजे जाते है ....वन अधिकारी चाहते भी है हर साल शेरो की गड़ना हो,शेरो के संरक्षण पर सरकार ध्यान दे...शेरो के संरक्षण पर सरकार ध्यान देगी तभी तो वन अधिकारियों के चेहरे शेरो की तरह दहाड़ते नजर आयेंगे.....ऐसे में कुत्तो की अचानक जंगल में इंट्री विभाग के काबिल अधिकारियों की आगामी योजना का खाका खीच देती है....शेरो के नाम पर करोडो का वारा-न्यारा करने वाले अब मुंह का स्वाद बदलना चाहते है....तभी तो यकाएक कुत्ते जंगल में आतंक मचाने लगे........अब चीतल,हिरन जैसे वन्य प्राणी आसानीसे अधिकारियों और उनके ख़ास मेहमानों के मुह का स्वाद बदलेंगे क्योकि कुत्ते आतंक जो मचा रहे है....? अब कुत्तो को जंगल से खदेड़ने या फिर मारने के नाम पर सरकारी फंड आएगा.....कुछ कुत्तो पर खर्च होगा कुछ मेरी बिरादरी वालो पर और बाकी बचा जंगल का बड़ा साहेब बिना डकार लिए पचा जायेगा....कुत्तो का आतंक ख़त्म हो ना हो जंगल से अब शेरो का झूठा खौफ जरुर ख़त्म हो गया है....

Tuesday, November 9, 2010

महफूज नही है महिलाएं दिल्ली में




हमारे पुराणों धार्मिक ग्रंथो मी यू तो महिलाओ की स्थिति देवी के समान दर्शया गया है , लेकिन हमेशा से ही उनको अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता रहा है , चाहे वो सीता के रूप मे हो या फ़िर आज की गुडिया ...

दिल्ली मे महिलाओ की स्थिति की चर्चा करे तो राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली जैसे आधुनिक शहर मे महिलाओ के खिलाप अपराध मे सबसे ज्यादा बढोत्तरी हुई है । कभी तंत्र - मंत्र के नाम पर की हत्या कर दी जाती है तो कही पड़ोसी द्वारा बलात्कार यह पीडा किसी भी रूप मे हो सकती है ।

दिल्ली मे अभी हाल ही मे एक सर्वे के अनुसार बलात्कार के ५३३ मामले और छेड़ छाड़ के ६२९ मामले दर्ज किए गए है । यह आकडे एनी बड़े शहरो की तुलना मे काफी अधिक है । ऐसे मामलो मे निरंतर ब्रिधि का सबसे बड़ा कारण है दोषी के ऊपर न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध न होना ।

यू तो हर तरह के अपराध से निपटने के लिय कानून है पर यह सब अपराध के आगे फिसड्डी नजर आते है , राष्ट्रीय महिला आयोग की माने तो बलात्कार छेड़ छाड़ एवं अगवा जैसे मामलो मे आरोप सिद्ध न होना एक चिंता का विषय है । देश भर मे २००६-०७ मे ३७ हजार मामले सामने आए है जिनमे दोष सिद्धि का प्रतिशत ३० से भी कम था , और एक बात बलात्कार के मामले मे तो यह आकडा २७ % से अधिक नही बढ़ पाया ।

समाज मे बलात्कार पिडिता एक दर्द लिए हर दिन मरती रहती है , ऐसे मे इन पिदितो के लिए कुछ प्रावधान होने चाहिए ताकि वे समाज की मुख्यधारा से जुड़ सके । ज्यादातर मामलो मे पिडिता बदनामी के डर से पुलिस मे मामला दर्ज ही नही कराती है ।
 
"जियाउददीन"

Sunday, November 7, 2010

एक आर्थिक-सामाजिक समस्या

तथ्य के आधार पर पृथ्वी नाम के इस गृह पर दस करोड़ से अधिक
कन्याओं को धरती पर आने से पहले मौत के घाट उतारा जा चुका है। कुदरत की कहें तो
मादा शिशु की जीवन शक्ति नर की तुलना में अधिक होती है। इस प्रकार यदि कन्या भ्रूण
हत्या को बंद किया जा सके तो मानव समाज में नर की तुलना में मादाओं की संख्या अधिक
होगी। इसके विपरीत वस्तुस्थिति में मादा से नर की संख्या का अनुपात निरंतर गिर रहा
है। विडंबना यह कि मानव समाज के सभ्य और विकसित कहे जाने वाले वर्ग में कन्या भ्रूण
हत्या सर्वाधिक प्रचलन में है।

भारत में और सारे विश्व में आदिम
जातियों-जनजातियों में महिलाओं को अधिक मान-सम्मान और स्वीकृति का स्थान प्राप्त
है। पश्चिमी मध्यप्रदेश के भील-भिलालों के आदिवासी जनसमुदाय में कन्य जन्म बड़ी
प्रसन्नता का विषय होता है। सामाजिक व्यवस्थाओं में आर्थिक कारणों से यहां महिलाओं
को स्त्री धन के रूप में मान्यता प्रप्त है और यही आर्थिक कारण तथाकथित सभ्य विकसित
समाजों में क्या भ्रूण हत्या की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं। एक नर व मादा शिशु के
पालन-पोषण में लगभग समान लागत आती है, जबकि कन्याओं को परिपक्वता तक लाना अधिक
जिम्मेदारी और जवाबदारी का काम है। सभ्य समाजों का कठोर सत्य यह है कि कन्याओं के
पालन-पोषण का यह निवेश सामाजिक संबंधों में उसके अपने किसी लाभ का नहीं
होता।

कन्या की योग्यता या कोई भी संभावित लाभ वर पक्ष के ही खाते में आता
है। हां, किसी घटना-दुर्घटना की स्थिति में वधू के प्रति कन्या पक्ष की जवाबदारी
आजीवन बनी रहती है। इसके भी ऊपर शादी संबंधों में दहेज की प्रथा समझ के परे है।
सभ्य समाज की व्यवस्थाओं का तर्कसंगत आकलन करें तो कौन मूर्ख ऎसा निवेश करेगा,
जिसमें अपना लाभ तो शून्य हो उलटा हानि भी तय हो, ऊपर से आजीवन जिम्मेदारी और
जवाबदारी अलग। आदिवासी जातियों-जनजातियों में लड़की के बदले धन लेने की जो प्रथा है
उससे कन्या भ्रूण हत्या का प्रत्यक्ष समाधान तो मिलता है, लेकिन यहां भी कन्या को
खरीद-फरोख्त का विषय ही माना गया है। कन्या भ्रूण हत्या निश्चित ही हत्या के समकक्ष
निंदनीय अपराध है, लेकिन संवैधानिक व्यवस्थाओं में इसका निर्णायक समाधान मिलना तीन
काल में संभव नहीं, क्योंकि अपराध की जड़ सामाजिक, आर्थिक कारणों में है। मूल
मुद्दे को हल किए बिना देश का शासन-प्रशासन अपनी पूरी ताकत झोंककर भी कन्या भ्रूण
हत्या और गर्भपात को नहीं रोक सकता। इस दिशा में किसी सार्थक समाधान के लिए सबसे
पहले हमें यह स्वीकारना होगा कि हर जीव अपने आप में स्वतंत्र सत्ता है। फिर व्यवहार
में हमें ऎसी सामाजिक व्यवस्थाओं का विकास करना होगा, जहां लिंगभेद के परे हर
व्यक्ति स्वतंत्र जीवन-यापन कर सके। महिलाओं में बढ़ती आर्थिक स्वतंत्रता इस दिशा
मे सकारात्मक परिणाम ला सकती है।

शासकीय स्तर पर महिलाओं के लिए विशेष लाभ
की जो योजनाएं लाई जाती हैं, वे लिंगभेद पर ही आधारित हैं, जबकि निर्णायक हल भेदभाव
के समाधान में छुपा है। दहेज प्रथा, लड़कियों की खरीद-फरोख्त या कन्या भ्रूण हत्या
सबके मूल में लिंगभेद ही प्राथमिक कारण है। फिर नर की तुलना में हर दृष्टि से अधिक
सक्षम, योग्य और उपयोगी होने के बावजूद मादा का अवमूल्यन करने की सामाजिक धारणा का
कोई तर्कसंगत आधार नहीं है। अभिजात्य वर्ग की बात करें तो आपके पुत्र के स्थान पर
पुत्री आपकी वारिस क्यों नहीं हो सकती? मध्यमवर्गीय परिवारों को लें तो आपकी बेटी
आपके बुढ़ापे का सहारा बने इसमें क्या कठिनाई है? शादी के बाद यदि लड़का, लड़की के
परिवार में रहे तो क्या बुराई है?

हमें बस एक बार लिंगभेद को अपने मन से
निकालकर सामाजिक व्यवस्थाओं का स्वाभाविक पुनर्गठन करना है। बिना किसी पूर्वाग्रह
के समाज में शादी संबंधों को तर्कसंगत विचार देना है। भारत में जहां पालतू पशुओं को
भी पशुधन से अधिक जीवन का हिस्सा माना जाता है, çस्त्रयों की धन से तुलना कर देखना
सरासर अन्याय है। çस्त्रयों को धन हानि का सूत्रधार बनाने की सामाजिक व्यवस्थाएं
गलत हैं तो धन लाभ के लिए çस्त्रयों को सहेजना भी गलत है। संबंधों का सामाजिक विकास
तो सार्थक होगा, जब çस्त्रयों को धन के लाभ-हानि से परे एक स्वतंत्र सत्ता की
मान्यता मिले। आर्थिक, सामाजिक व्यवस्थाओं में लिंगभेद का कोई स्थान ही न हो।
संवैधानिक व्यवस्थाओं में युक्तियुक्तकरण के द्वारा समाज में समानता का पोषण किया
जाए। भारत को अपने भविष्य के लिए भेदभाव का यह भ्रम आज ही छोड़ना होगा।

"जियाउददीन"

Friday, November 5, 2010

चीनी हो या जापानी, अब समझे हिंदुस्तानी

चीनी हो या जापानी, अब समझे हिंदुस्तानी

गूगल के भाषाई तोहफ़े जारी हैं. गूगल ट्रांसलेट के आज जारी नए अंतरपटल के जरिए हिंदी से केवल अंग्रे़ज़ी ही नहीं विश्व की कई लोकप्रिय भाषाओं से दुतरफा अनुवाद संभव हो गया है.

यानी पूरी दुनिया की बात आप और आपकी बात पूरी दुनिया समझ सकती है. चीनी या जापानी में लिखे वेब पन्ने भी आपके लिए अब भैंस बराबर नहीं रहेंगे और आपका ब्लॉग अब किसी अरब, इतालवी, या फ्रेंच के लिए भी पल्ले से बाहर नहीं रहेगा. गूगल ने वाकई दुनिया छोटी कर दी है.

उदाहरण के लिए, इस पन्ने को रुसीफ्रांसीसीजर्मनस्पैनिश भाषाओं में देखिए.

साथ ही चीनी साइट बाइदू हो या अरबी का अख़बार अशरक़ अल-अवसात, अब आप इन्हें अपनी भाषा में अपने जाने पहचाने अक्षरों में पढ़ सकते हैं. 
हिंदी पाठकों के लिए दुनिया के दरवाज़े इस कदर पहले शायद कभी नहीं खुले. अधपके अनुवाद का धुँधलका ज़रूर है, पर तस्वीर समझ में आ ही जाती है.


अब सीएनएन के पन्ने को ऐसे हिंदी में देखने के लिए उनके हिंदी संस्करण का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं..

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Tuesday, November 2, 2010

वयस्क साक्षरता स्कोर - चीन 93, भारत 66 UNESCO ने मई 2008 में विश्व साक्षरता के नए आँकड़े प्रकाशित किए.



किन्हीं फ़्रेडरिक हूबलर ने अपने ब्लॉग पर इन आँकड़ो को दुनिया के नक्शे पर लगाकर दिखाया है. उनके विश्लेषण के अनुसार जिन 145 देशों के लिए आँकड़े उपलब्ध हैं उनमें वयस्क साक्षरता दर का माध्य 81.2% है. वयस्क साक्षरता दर यानी 15 साल या उससे बड़े लोगों की साक्षरता का प्रतिशत. 90% से ऊपर की दर वाले 71 देशों में सेअधिकतर योरप, पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया, और दक्षिण अमेरिका में हैं. जिन देशों का डाटा उपलब्ध नहीं है वहाँ भी दर 90% से अच्छी ही होने की अपेक्षा है क्योंकि उनमें से अधिकतर विकसित देश हैं. पिछड़े देशों में से लगभग सभी या तो अफ़्रीका में है या दक्षिण एशिया में.

सबसे बड़े दो देश चीन और भारत अलग-अलग तस्वीर पेश करते हैं. चीन में जहाँ 93.3% लोग पढ़-लिख सकते हैं, भारत में केवल 66%.

आँकड़े ख़ुद अपनी कहानी कहते हैं. पर इन्हें अलग नज़रियों से देखना अक्सर दिलचस्प नतीजे दे जाता है. ऊपर का विश्लेषण समस्या के भौगोलिक वर्गीकरण पर केंद्रित है. अब अगर इन्हीं आँकड़ों को भाषाई नज़रिये से देखा जाए तो देखिये क्या तस्वीर सामने आती है.

ये रहे शीर्ष 15 देश, उनका साक्षरता प्रतिशत, और उनकी आधिकारिक भाषाएँ:

एस्टोनिया - 99.8 - एस्टोनियन, वोरो
लातविया - 99.8 - लातवियन, लातगेलियन
क्यूबा - 99.8 - स्पैनिश
बेलारूस - 99.7 - बेलारूसी, रूसी
लिथुआनिया - 99.7 - लिथुआनियन
स्लोवेनिया - 99.7 - स्लोवेनियन
उक्रेन - 99.7 - उक्रेनी
कज़ाख़िस्तान - 99.6 - कज़ाख़
ताजिकिस्तान - 99.6 - ताजिक
रूस - 99.5 - रूसी
आर्मेनिया - 99.5 - आर्मेनियन
तुर्कमेनिस्तान - 99.5 - तुर्कमेन
अज़रबैजान - 99.4 - अज़रबैजानियन
पोलैंड - 99.3 - पोलिश
किरगिज़स्तान - 99.3 - किरगिज़


और अब देखिये साक्षरता दर में नीचे के 20 देश (भारत भी इनमें शामिल है):

भारत - 66 - अंग्रेज़ी, हिंदी
घाना - 65 - अंग्रेज़ी और स्थानीय भाषाएँ
गिनी बिसाउ - 64.6 - पुर्तगाली
हैती - 62.1 - फ्रांसीसी, हैती क्रिओल
यमन - 58.9 - अरबी
पापुआ न्यू गिनी - 57.8 - अंग्रेज़ी व 2 अन्य
नेपाल - 56.5 - नेपाली
मारिशियाना - 55.8 - फ्रांसीसी
मोरक्को - 55.6 - फ्रांसीसी, अरबी
भूटान - 55.6 - अंग्रेज़ी, जोंग्खा
लाइबेरिया - 55.5 - अंग्रेज़ी
पाकिस्तान - 54.9 - अंग्रेज़ी
बांग्लादेश - 53.5 - बांग्ला
मोज़ाम्बीक़ - 44.4 - पुर्तगाली
सेनेगल - 42.6 - फ्रांसीसी
बेनिन - 40.5 - फ्रांसीसी
सिएरा लियोन - 38.1 - अंग्रेज़ी
नाइजर - 30.4 - अंग्रेज़ी
बरकीना फ़ासो - 28.7 - फ्रांसीसी
माली - 23.3 - फ्रांसीसी

आपको कुछ कहते हैं ये आँकड़े?

क्या इनमें यह नहीं दिखता कि निचले अधिकतर देशों में आधिकारिक या शासन की भाषा आम लोगों द्वारा बोले जानी वाली भाषा से अलग (अक्सर औपनिवेशिक) है, जबकि सर्वाधिक साक्षर देशों में शिक्षा का माध्यम और शासन की भाषा वही है जो वहाँ के अधिकतर लोग बोलते हैं?

मैं ये नहीं कहता कि सिर्फ़ यही एक कारण होगा या इतना भी कि यही सबसे महत्वपूर्ण कारण है. ऐसा मानना एक गूढ़ समस्या का अतिसरलीकरण होगा. ऐसे कुर्सीविराजित-विश्लेषण (आर्मचेयर एनैलिसिस) में मेरा विश्वास भी नहीं है. पर क्या ये नज़रिया इतना वजनी
भी नहीं है कि इस दिशा में कम से कम गंभीरता से सोचा जाए ?

ZIAUDDIN