ZIAUDDIN

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Wednesday, November 17, 2010

ये राजगोपाल हैं ...


     "खादी का कुरता-पायजामा,पैर में साधारण सी सैंडिल और काफी सरल स्वाभाव"....जो नही जानता उसके लिए वो शख्स कुछ भी नही है...मै जानता था टीवी,अखबारों और किताबो के जरिये,इस कारण मेरे लिए ऐसी शख्सियत से मुलाकात कई मायनो में ख़ास थी....सीधा,सरल लेकिन आदिवासियों के हक़ के लिए संघर्ष का तेवर बड़ा ही सख्त....इस ख़ास शख्सियत का नाम राजगोपाल पी.व्ही.है...जितना सुना था उससे कही ज्यादा है राजगोपाल जी...प्रेस क्लब में आज आये और प्रेस कांफ्रेंस के जरिये जल,जंगल,जमीन पर खूब बोले....आदिवासियों के हक के लिए पिछले २ दशक से संघर्ष करते राजगोपाल साफ़ कहते है की सरकार वन अधिकार कानून का पालन करे...वैसे तो राजगोपाल के संघर्ष की कहानी तब से शुरू होती है जब मै इस दुनिया में आया ही नही था...राजगोपाल जी के करीबियों की माने तो जिस वक्त मध्यप्रदेश के चम्बल में डाकुओ का आतंक था वो एस.एन. सुब्बाराव नाम के शख्स के साथ किशोर अवस्था से जुड़ गए....ये वही सुब्बाराव थे जिनकी पहल पर ७०० डाकुओ ने आत्मसमर्पण किया था... सुब्बाराव के साथ काम करने वाले राजगोपाल ने वर्ष १९७२ के बाद फिर कभी मुड़कर नही देखा....संघर्ष यात्रा का सफ़र काफी लंबा है,हौसले इतने बुलंद है की सफर की दूरी का पता ही नही चल रहा है....मैंने राजगोपाल जी को जितना पास से आज देखा उतने ही गौर से करीब ३२ मिनट तक सुनता रहा....आदिवासियों के हित संवर्धन के लिए बढ़ते कदमो को इस बार भी सफलता मिलेगी तय है.....आज राजगोपाल जी ने प्रेस क्लब में जो कहा उसमे प्रमुख रूप से वनवासियों को उनका वाजिब हक़ सरकार दे.....राजगोपाल जी कहते है २००७ से २०१० के बीच केंद्र सरकार ने आदिवासियों के विकास पर ४२०० करोड़ रूपये खर्च किये.....करोडो रुपयों का खर्च आज तक आदिवासियों के तन पर ठीक से लंगोट भी नही दिला पाया....भ्रष्टाचार की जड़ो से निकली साखो ने आदिवासियों का हक़ छीन लिया....राजगोपाल जी मानते है की कंक्रीट के जंगलो ने आदिवासियों की जमीने लील ली....आदिवासियों को उनकी पुश्तैनी जमीन से बेदखल कर दिया गया जो कानूनन गलत है....जल,जंगल,जमीन के लिए आने वाले बर्षो की कार्ययोजना भी तैयार है....वर्ष २०१२ में आदिवासियों की लड़ाई लड़ने वाले ग्वालियर से दिल्ली के लिए कूच करेंगे.....अहिंसात्मक सत्याग्रह के जरिये  सरकार पर दबाव बनाने पदयात्रा की जाएगी.....राजगोपाल जी और उनके असंख्य साथियो का सफ़र जारी है....आदिवासियों,किसानो को उनका वाजिब हक़ दिलाने के लिए हजारो किलोमीटर का लम्बा सफ़र तय करते राजगोपाल जी भारत सरकार द्वारा प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बने राष्ट्रीय भूमि सुधार परिषद् के सदस्य भी है....उम्मीद करता हूँ जिस मकसद को लेकर यात्रा जारी है उसकी मंजिल जल्दी मिल जाएगी......
                                                                                       छत्तीसगढ़,मध्यप्रदेश,उड़ीसा,झारखण्ड जैसे राज्यों में आदिवासियों की हालत काफी खराब है....इन बातो को बड़ी ही दमदारी से कहते राजगोपाल जी नक्सलवाद पर भी काफी कुछ  कह गये....उन्होंने साफ़ कहा की छत्तीसगढ़ में न्याय और रोटी नही मिलने का नतीजा है नक्सलवाद....सरकार से खिन्न और असंतुष्ट लोगो ने हिंसा का रास्ता अख्तियार कर रखा है....वो ये भी कहते है कि सरकारों के कामकाज से कई संगठन भी असंतुष्ट है लेकिन अहिंसा,सत्याग्रह का रास्ता अपनाकर मांगो को मनवाने की कोशिश की जा रही है....राजगोपाल जी ने ये तो कह ही दिया की नक्सली हिंसा का रास्ता छोड़कर अहिंसा की राह पकडे और सरकार भी अपनी भूल सुधार कर असंतुष्टो की रोटी,न्याय के लिए ठोस योजना बनाए.....
                                                 राजगोपाल जी से हम दूध के धुले होने की उम्मीद नही रखते लेकिन राजगोपाल जैसे लोगो ने कम से कम गांधी के रास्ते से समाज के आखरी आदमी के लिए लड़ाई तो शुरू की है....राजगोपाल जैसे लोग हमारे जैसे लोगो के लिए अँधेरे में जल रही एक कंडील की तरह है जिनसे उम्मीद जगती है अभी सब कूच ख़त्म नही हुआ है....दुनिया को सुन्दर बनाने के लिए कुछ लोग अब कोशिश कर रहे है....हमारे जैसे लोग उस टिटिहरी के साथ है जिसके अंडे समुन्दर बहा ले गया है और वह उसी दिन से रेत ला-ला कर उस समुन्दर को भरने की कोशिश कर रही है.....

Saturday, November 13, 2010

चकल्लस में मीडिया...


नमस्कार दोस्तों --
 मीडिया..........हर जगह ये लोग पहुंचे रहते है....बिना बताये और बिना बुलाये....अभी हाल ही में शिरडी में एक घटना घटी...या कहे कि घटना घटा दी गयी...
मीडिया के साथ बदसलूकी का पूरा ठीकरा रितिक रोशन पर फोड़ दिया गया.. पूरा माजरा हम आपको बताते है कि क्या हुआ था उस दिन.....फिल्म अभिनेता रितिक रोशन अपने परिवार के साथ शिरडी के सांई बाबा के मंदिर में दर्शन करने गये थे...जो कि वो हमेशा किसी भी फिल्म के रिलीज होने के पहले करते है....ऐसा इस बार भी किये..लेकिन घटना ये घटी कि बिना बुलाये मेंहमान वहां भी पहुंच गये....फिर क्या होना था...वही जो बिना बुलाये मेहमान करते है...धक्का मुक्की का दौर चला...और इल्जाम लगा रितिक रोशन पर...रितिक को कहा गया कि वो फिल्म के पब्लिसिटी के लिये इस तरीके की हरकत कर रहे है..जबकि रितिक ने ट्विटर पर लिखे कि ये उनका निजी दौरा था जिसमें वो मीडिया को मना कर रहे थे लेकिन मीडिया ने नहीं माना और उनका फोटो खीचने लगें...जिसकी वजह से ये सारा मामला हो गया...अब रितिक रोशन को भी समझना चाहिये कि शिरडी के सांई बाबा उनके अकेले तो है नही...मीडिया ने बकायदा मंदिर प्रशासन से अनुमति लेके मंदिर में प्रवेश किया था....खैर ऐसे मौको पर मीडिया ताक में रहती है कि कोई घटना ऐसी हो जाये जिससे उनको मशाला मिल जाये...भाई मीडिया के बारे में जहां तक मै जानता हूं वहां एक बात सामने निकल के आती है..वो बात ये है कि रिपोर्टर जब भी किसी ख़बर के लिये ऑफिस से निकलता है तब उसका मेन मोटो यही होता है कि कोई ब्रेकिंग मिल जाये नहीं तो बना ली जायेगी क्योंकि बॉस की तारीफ जो बटोरनी है...इन रिपोर्टर लोगो को ये पता होना चाहिये कि वो इन सस्ती टीआरपी के चक्कर में जो काम करते है उससे सामने वाले के दिल पर क्या बीतती है....न्यूज़ चैनल वालो के लिये सबसे बड़ी खबर वॉलीवुड से होती है...अगर मुंबई में किसी कलाकार को छींक आ गयी तो ये लोग पूरे मुंबई के तापमान का पोस्टमॉर्टम कर देंगे....लेकिन अगर उड़ीसा या फिर झारखंड में किसी नक्सली का कहर टूटेगा तो ये उस ख़बर को महज टिकर में अपडेट कर देते है......खैर रितिक रोशन जैसा मामला खली और कुछ दिन पहले टीम इंडिया के स्पिनर हरभजन सिंह के साथ हुआ.....अब देखने वाली बात ये होगी कि कभी सच्चाई को सामने लाने की मुहिम में लगी मीडिया अपने पुराने अस्तित्व में कब लौटेगी ।
"जियाउददीन"
 

Friday, November 12, 2010

कुत्तो का आतंक ..

अचानकमार में कुत्तो का आतंक .......जो लोग अचानकमार अभ्यारण्य को नही जानते उनके लिए ये खबर चौकाने वाली नही  होगी...मेरे लिए और उन सब के लिए ये खबर जरुर कई मायनो में ख़ास है...हमने अचानकमार इलाके को काफी करीब से देखा और जाना है...बात कल ही की तो है...मै अपने दफ्तर में बैठा अखबार के पन्ने पलट रहा था..."अचानकमार में कुत्तो का आतंक"...इस शीर्षक पर नजर पड़ी तो खबर पढने का मन हुआ...पूरा पढने के बाद मै सोचने लगा अभयारण्य के भीतर बड़ी संख्या में कुत्ते आखिर आये कहाँ से...जंगल में कुत्ते है,या खबर के जरिये कुत्तो का आतंक फैलाया जा रहा है....सच तो वही बताएगा जिसने बिना कुत्तो के आतंक झलकाती तस्वीर के आतंक फैलाने की कोशिश की है....ये खबर उनके लिए भी चौकाने वाली हो सकती है जो अचानकमार को "शेरो"के नाम से जानते है...केवल जानते है....जी हाँ पिछले १० बरसो में मैंने तो शेर नही देखा...वन महकमे के अधिकारियों से जितना सुना उसके मुताबिक जंगल में २६ "टाइगर" है...हाँ वो आंकड़े वाले शेर वी.वी.आइपी को जरुर दिख जाते है...उसके लिए वन महकमा पहले से मुनादी करवाता है और वी.वी.आइपी को शेर दिखा दिया जाता है...जिस अचानकमार अभ्यारण्य में २६ शेर है वहाँ कुत्तो का आतंक ? बड़ा अटपटा सा लगता है...मैंने सोचा मेरे ही एक साथी ने खबर छापी  है जरुर कुछ तो ख़ास होगा...फिर ख़याल आया कोई नई बात थोड़े ही है,वन महकमे का अधिकारी जब चाहता है अखबार में शेर दिख जाता है...जब उसकी इच्छा होती है जंगल में कुत्ते आतंक मचाने लगते है....जरूर इस बार कुत्तो की बारी लगती है ऐसा सोच कर मैंने अखबार के पन्ने को पलट दिया....अरे जिस अचानकमार अभयारण्य को अधिकारी की काबिलियत पर बिना शेर की गड़ना हुए "टाइगर रिजर्व" बना दिया गया हो,जहाँ करोडो रूपये उन शेरो के संरक्षण पर खर्च कर दिए गए हो जिनकी वास्तविक संख्या का पता आज तक नही चल सका है,वहाँ कुत्तो का आतंक मचा हो नया नही लगता...हर साल शेरो की गिनती होती है,उनके पगचिन्ह खोजे जाते है ....वन अधिकारी चाहते भी है हर साल शेरो की गड़ना हो,शेरो के संरक्षण पर सरकार ध्यान दे...शेरो के संरक्षण पर सरकार ध्यान देगी तभी तो वन अधिकारियों के चेहरे शेरो की तरह दहाड़ते नजर आयेंगे.....ऐसे में कुत्तो की अचानक जंगल में इंट्री विभाग के काबिल अधिकारियों की आगामी योजना का खाका खीच देती है....शेरो के नाम पर करोडो का वारा-न्यारा करने वाले अब मुंह का स्वाद बदलना चाहते है....तभी तो यकाएक कुत्ते जंगल में आतंक मचाने लगे........अब चीतल,हिरन जैसे वन्य प्राणी आसानीसे अधिकारियों और उनके ख़ास मेहमानों के मुह का स्वाद बदलेंगे क्योकि कुत्ते आतंक जो मचा रहे है....? अब कुत्तो को जंगल से खदेड़ने या फिर मारने के नाम पर सरकारी फंड आएगा.....कुछ कुत्तो पर खर्च होगा कुछ मेरी बिरादरी वालो पर और बाकी बचा जंगल का बड़ा साहेब बिना डकार लिए पचा जायेगा....कुत्तो का आतंक ख़त्म हो ना हो जंगल से अब शेरो का झूठा खौफ जरुर ख़त्म हो गया है....

Tuesday, November 9, 2010

महफूज नही है महिलाएं दिल्ली में




हमारे पुराणों धार्मिक ग्रंथो मी यू तो महिलाओ की स्थिति देवी के समान दर्शया गया है , लेकिन हमेशा से ही उनको अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ता रहा है , चाहे वो सीता के रूप मे हो या फ़िर आज की गुडिया ...

दिल्ली मे महिलाओ की स्थिति की चर्चा करे तो राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली जैसे आधुनिक शहर मे महिलाओ के खिलाप अपराध मे सबसे ज्यादा बढोत्तरी हुई है । कभी तंत्र - मंत्र के नाम पर की हत्या कर दी जाती है तो कही पड़ोसी द्वारा बलात्कार यह पीडा किसी भी रूप मे हो सकती है ।

दिल्ली मे अभी हाल ही मे एक सर्वे के अनुसार बलात्कार के ५३३ मामले और छेड़ छाड़ के ६२९ मामले दर्ज किए गए है । यह आकडे एनी बड़े शहरो की तुलना मे काफी अधिक है । ऐसे मामलो मे निरंतर ब्रिधि का सबसे बड़ा कारण है दोषी के ऊपर न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध न होना ।

यू तो हर तरह के अपराध से निपटने के लिय कानून है पर यह सब अपराध के आगे फिसड्डी नजर आते है , राष्ट्रीय महिला आयोग की माने तो बलात्कार छेड़ छाड़ एवं अगवा जैसे मामलो मे आरोप सिद्ध न होना एक चिंता का विषय है । देश भर मे २००६-०७ मे ३७ हजार मामले सामने आए है जिनमे दोष सिद्धि का प्रतिशत ३० से भी कम था , और एक बात बलात्कार के मामले मे तो यह आकडा २७ % से अधिक नही बढ़ पाया ।

समाज मे बलात्कार पिडिता एक दर्द लिए हर दिन मरती रहती है , ऐसे मे इन पिदितो के लिए कुछ प्रावधान होने चाहिए ताकि वे समाज की मुख्यधारा से जुड़ सके । ज्यादातर मामलो मे पिडिता बदनामी के डर से पुलिस मे मामला दर्ज ही नही कराती है ।
 
"जियाउददीन"

Sunday, November 7, 2010

एक आर्थिक-सामाजिक समस्या

तथ्य के आधार पर पृथ्वी नाम के इस गृह पर दस करोड़ से अधिक
कन्याओं को धरती पर आने से पहले मौत के घाट उतारा जा चुका है। कुदरत की कहें तो
मादा शिशु की जीवन शक्ति नर की तुलना में अधिक होती है। इस प्रकार यदि कन्या भ्रूण
हत्या को बंद किया जा सके तो मानव समाज में नर की तुलना में मादाओं की संख्या अधिक
होगी। इसके विपरीत वस्तुस्थिति में मादा से नर की संख्या का अनुपात निरंतर गिर रहा
है। विडंबना यह कि मानव समाज के सभ्य और विकसित कहे जाने वाले वर्ग में कन्या भ्रूण
हत्या सर्वाधिक प्रचलन में है।

भारत में और सारे विश्व में आदिम
जातियों-जनजातियों में महिलाओं को अधिक मान-सम्मान और स्वीकृति का स्थान प्राप्त
है। पश्चिमी मध्यप्रदेश के भील-भिलालों के आदिवासी जनसमुदाय में कन्य जन्म बड़ी
प्रसन्नता का विषय होता है। सामाजिक व्यवस्थाओं में आर्थिक कारणों से यहां महिलाओं
को स्त्री धन के रूप में मान्यता प्रप्त है और यही आर्थिक कारण तथाकथित सभ्य विकसित
समाजों में क्या भ्रूण हत्या की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं। एक नर व मादा शिशु के
पालन-पोषण में लगभग समान लागत आती है, जबकि कन्याओं को परिपक्वता तक लाना अधिक
जिम्मेदारी और जवाबदारी का काम है। सभ्य समाजों का कठोर सत्य यह है कि कन्याओं के
पालन-पोषण का यह निवेश सामाजिक संबंधों में उसके अपने किसी लाभ का नहीं
होता।

कन्या की योग्यता या कोई भी संभावित लाभ वर पक्ष के ही खाते में आता
है। हां, किसी घटना-दुर्घटना की स्थिति में वधू के प्रति कन्या पक्ष की जवाबदारी
आजीवन बनी रहती है। इसके भी ऊपर शादी संबंधों में दहेज की प्रथा समझ के परे है।
सभ्य समाज की व्यवस्थाओं का तर्कसंगत आकलन करें तो कौन मूर्ख ऎसा निवेश करेगा,
जिसमें अपना लाभ तो शून्य हो उलटा हानि भी तय हो, ऊपर से आजीवन जिम्मेदारी और
जवाबदारी अलग। आदिवासी जातियों-जनजातियों में लड़की के बदले धन लेने की जो प्रथा है
उससे कन्या भ्रूण हत्या का प्रत्यक्ष समाधान तो मिलता है, लेकिन यहां भी कन्या को
खरीद-फरोख्त का विषय ही माना गया है। कन्या भ्रूण हत्या निश्चित ही हत्या के समकक्ष
निंदनीय अपराध है, लेकिन संवैधानिक व्यवस्थाओं में इसका निर्णायक समाधान मिलना तीन
काल में संभव नहीं, क्योंकि अपराध की जड़ सामाजिक, आर्थिक कारणों में है। मूल
मुद्दे को हल किए बिना देश का शासन-प्रशासन अपनी पूरी ताकत झोंककर भी कन्या भ्रूण
हत्या और गर्भपात को नहीं रोक सकता। इस दिशा में किसी सार्थक समाधान के लिए सबसे
पहले हमें यह स्वीकारना होगा कि हर जीव अपने आप में स्वतंत्र सत्ता है। फिर व्यवहार
में हमें ऎसी सामाजिक व्यवस्थाओं का विकास करना होगा, जहां लिंगभेद के परे हर
व्यक्ति स्वतंत्र जीवन-यापन कर सके। महिलाओं में बढ़ती आर्थिक स्वतंत्रता इस दिशा
मे सकारात्मक परिणाम ला सकती है।

शासकीय स्तर पर महिलाओं के लिए विशेष लाभ
की जो योजनाएं लाई जाती हैं, वे लिंगभेद पर ही आधारित हैं, जबकि निर्णायक हल भेदभाव
के समाधान में छुपा है। दहेज प्रथा, लड़कियों की खरीद-फरोख्त या कन्या भ्रूण हत्या
सबके मूल में लिंगभेद ही प्राथमिक कारण है। फिर नर की तुलना में हर दृष्टि से अधिक
सक्षम, योग्य और उपयोगी होने के बावजूद मादा का अवमूल्यन करने की सामाजिक धारणा का
कोई तर्कसंगत आधार नहीं है। अभिजात्य वर्ग की बात करें तो आपके पुत्र के स्थान पर
पुत्री आपकी वारिस क्यों नहीं हो सकती? मध्यमवर्गीय परिवारों को लें तो आपकी बेटी
आपके बुढ़ापे का सहारा बने इसमें क्या कठिनाई है? शादी के बाद यदि लड़का, लड़की के
परिवार में रहे तो क्या बुराई है?

हमें बस एक बार लिंगभेद को अपने मन से
निकालकर सामाजिक व्यवस्थाओं का स्वाभाविक पुनर्गठन करना है। बिना किसी पूर्वाग्रह
के समाज में शादी संबंधों को तर्कसंगत विचार देना है। भारत में जहां पालतू पशुओं को
भी पशुधन से अधिक जीवन का हिस्सा माना जाता है, çस्त्रयों की धन से तुलना कर देखना
सरासर अन्याय है। çस्त्रयों को धन हानि का सूत्रधार बनाने की सामाजिक व्यवस्थाएं
गलत हैं तो धन लाभ के लिए çस्त्रयों को सहेजना भी गलत है। संबंधों का सामाजिक विकास
तो सार्थक होगा, जब çस्त्रयों को धन के लाभ-हानि से परे एक स्वतंत्र सत्ता की
मान्यता मिले। आर्थिक, सामाजिक व्यवस्थाओं में लिंगभेद का कोई स्थान ही न हो।
संवैधानिक व्यवस्थाओं में युक्तियुक्तकरण के द्वारा समाज में समानता का पोषण किया
जाए। भारत को अपने भविष्य के लिए भेदभाव का यह भ्रम आज ही छोड़ना होगा।

"जियाउददीन"